धर्म के आधार पर मुसलमानों के साथ भेदभाव करने वाले नागरिकता संशोधन क़ानून (CAA) के ख़िलाफ़ जारी देशव्यापी आंदोलन में युवा, ख़ास तौर पर महिलाएं, छात्राएं और छात्र सबसे आगे हैं।
हालांकि भारत जैसे रूढ़ीवादी समाज में उनके लिए यह किसी जोखिम से कम नहीं है।
मिसाल के तौर पर प्रिया जब प्रदर्शनों में भाग लेती हैं तो पुलिस के आतंक से ज़्यादा उन्हें अपने हिंदू राष्ट्रवादी पिता से डर लगता है कि कहीं उन्हें इसके बारे में पता चल जाए और वे उसकी पढ़ाई बीच में ही रोक दें।
नई दिल्ली में रहने वाली 20 वर्षीय प्रिया ने अपना असली नाम छिपाने की शर्त पर एएफ़पी को बताया कि "मेरे पिता मुसलमानों से बहुत नफ़रत करते हैं, यहां तक कि जब भी उन्हें किसी तरह का कोई नुक़सान पहुंचता है तो वे इसके लिए उन्हें क़सूरावर ठहराते हैं।"
"मैंने कई बार उनसे बात करने की कोशिश की। लेकिन हर बार बातचीत के बाद उन्होंने मुझे कॉलेज से निकाल लेने और शादी कर देने की धमकी दी।"
2014 में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के सत्ता संभालने के बाद देश भर में हिंदुओं और मुसलमानों को बांटने की कोशिशों के कारण, कई परिवारों की यही कहानी है।
प्रिया का कहना थाः "मेरे पिताजी व्हाट्सएप पर हमेशा मुझे फ़ेक न्यूज़ और मुसलमानों से नफ़रत वाले वीडियोज़ भेजते रहते हैं, ताकि मुझे क़ायल कर सकें, लेकिन वास्तव में मुझे इससे बड़ी निराशा होती है।"
उन्होंने आगे कहाः "इसके जवाब में, मैं उन्हें फ़ैक्ट-चैकिंग वेबसाइटों का लिंक भेज देती हूं, लेकिन लाजवाब होकर वे मुझे मेरी पढ़ाई रोक देने की धमकी देते हैं, जिसके कारण मुझे अपने माता-पिता से अपने सियासी विचार छिपाने के लिए मजबूर होना पड़ता है।"
उनका कहना है, "मेरे पिता को मेरे ट्विटर अकाउंट के बारे में जानकारी नहीं है, इसलिए कि उसका इस्तेमाल मैं अपनी पहचान छिपाकर करती हूं।"
भारत में युवाओं के मामलों पर फ़ोकस करने वाली न्यूज़ वेबसाइट यूथ की आवाज़ की चीफ़ एडिटर अंशुल तिवारी का कहना है कि इस व्हाट्सएप वार ने लोगों के रिश्तों को प्रभावित किया है।
हांगकांग में लोकतंत्र समर्थक प्रदर्शनों और दुनिया भर में जलवायु परिवर्तन आंदोलनों में युवाओं की भूमिका की तरफ़ इशारा करते हुए उन्होंने कहाः "आज युवा एक आवाज़ बनने और उस आवाज़ को सुने जाने को लेकर जागरुक हैं।"
"लेकिन कई मामलों में, दुनिया भर के युवाओं के विपरीत, भारतीय छात्रों पर माता-पिता का यह दबाव रहता है कि उन्हें कैसे जीना चाहिए और यहां तक कि कैसे सोचना चाहिए।"
27 वर्षीय श्वेता बगारिया (असली नाम नहीं) ने विरोध प्रदर्शनों में भाग लेने के कारण, अपने रूढ़िवादी माता-पिता पर शारीरिक और मानसिक यातनाएं देने का आरोप लगाया। लेकिन मुम्बई में रहने वाली बगारिया, प्रिया की तरह ही नए नागरिकता क़ानून के ख़िलाफ़ जारी आंदोलन में सक्रिय रूप से हिस्सा ले रही हैं, जिसे वह मानवाधिकारों का घोर हनन क़रार देती हैं।
"मैं एक साल पहले तक वास्तव में बहुत अकेला महसूस कर रही थी, लेकिन ट्विटर पर मुझे एक ऑनलाइन ग्रूप मिला, जिसके सदस्य अपने परिवारों में समान स्थिति से गुज़र रहे हैं।"
"मैं यह भी जानती हूं कि मेरा संघर्ष इस देश में दूसरों की तुलना में कुछ भी नहीं है, ख़ास तौर से मुसलमान जिस स्थिति से गुज़र रहे हैं।"